November 18, 2013

अररिया से किस्सा

एक मजदूर पंजाब से ढेर पैसा जमा कर के लौट रहा था. आनंद विहार टर्मिनल पर सीमांचल में बैठा, अररिया का मजदूर था पहली बार इतना पैसा बचा पाया था तो थोडा ज्यादा चौकन्ना था. एक ठग ने उसे देखते ही भांप लिया की भाई के पास ढेरी माल है. ठग ने अपना काम किया मजदूर से दोस्ती की, चाय में नींद की गोली मिलाई  और मजदूर भाई मीठी नींद सो गए. जब उनकी नींद खुली तो देखा सारा सामान पैसे सहित गायब! 

मजदूर के पास कोइ चारा न था मन को समझाया “ईश्वर की यही इच्छा थी” और तय किया  की जैसे भी हो घर पहुचना होगा। भूका प्यासा मजदूर साथी अररिया पहुंचा तो सोचा टेम्पो का पैसा तो है नहीं नदी के रास्ते ही घर निकल जाता हू. 

भूक प्यास से थका साथी जब नदी पर पहुंचा तो प्यास बुझाने के लिए वहाँ  रुक गया और फ्रेश भी हो लिया. जब मुह धोने के लिए पानी में झुका तो उसे एक सोने का सिक्का मिल गया. साथी ने सोचा “अररे यह तो बहुत है, जितने पैसा पंजाब में नहीं कमाया था उतना तो इस नदी में मिल गया.” पैसा खोने का सारा गम वह् भूल गया. पर सिक्के पर  ढेरी मिटटी जमा थी. साथी ने सोचा इस को धो लेता हुँ।  धोने के लिय  जैसे ही सिक्का पानी में डाला सिक्का हाथ से फिसल  गया और बहुत कोशिश के बाद भी मजदूर को वापिस नहीं मिला. इस बार मिली दौलत खो बैठने से मजदूर को गहरा सदमा पहुंचा और वह अपना दिमागी संतुलन खो बैठा... और बडबडाने लगा “धोले से बिन धोले बढ़िया” (धोये से बिन धोया अच्छा). उस समय वहा से गाँव का एक आदमी चचरी के पुल पर से अपनी साइकिल लिया जा रहा था. अपने गाँव के लड़के को इस हालत  में देख कर उसे साथ कर लिया। 

मजदूर साथी जब घर पहुंचा तो उस की माँ बहुत खुश हुई और उसे गले से लगा लिया पर  बेटा तो बडबडाता ही रहा “धोले से बबन धोले बहिया”. बुढ़िया  समझ गयी बेटे को कोइ गहरा सदमा लगा है तो उसने डॉक्टर बुलवा लिया। डॉक्टर ने कहा इलाज आसान है पर १०० रुपया खर्च देना होगा. बुढ़िया  ख़ुशी ख़ुशी मान गयी. डॉक्टर  ने साथी को एक सुई दी और साथी सो गया. डॉक्टर ने कहा बस अब यह सो के उठेगा तो ठीक हो जायेगा अब मेरा पैसा दो. गरीब बुढ़िया के पास केवल २० ही रुपया था जो उसने डॉक्टर को दिया और बोली बाकी जमा कर के कल दे दूँगी। डॉक्टर बोला “माई परेशान मत हो यह २० रुपया रख मैं १०० रुपये कल ही ले लूँगा”. सवेरे जब बेटा उठा तो माँ  ने उसे चाय दी दोनों ने कुछ बात चीत की फिर माँ  से रहा नहीं गया. उस ने कहा बेटा तू  कल क्यूँ  बार बार पर कह रहा था “धोले से बिन धोले बढ़िया”. पहले तो बेटा बोला नहीं ऐसा तो कुछ नहीं हो रहा था किर उसे अपना गम दुबारा याद आ गया और वह वापिस बोलने लगा “धोले से बिन धोले बढ़िया”. बुढ़िया दुखी हो गयी और वह भी बोलने लगी “कहले से बिन कहले बढ़िया” (कहा से बिन  कहा अच्छा). अब जब डॉक्टर आया और उसने बुहिया से फीस माँगी तो वह बोली “कहले से बिन कहले बढ़िया”.

पहले तो डॉक्टर खुश हो गया की एक और आमदनी होने वाली है पर जब वह  बुहिया के बेटे के पास पहुंचा तो वह भी हर बात पर बोला “धोले से बिन धोले बढ़िया”. तब डॉक्टर ने सर पीट र्लया, उसे भी फीस न मिलने का सदमा हो गया और वह कहने लगा “१०० टकिया से बीस टकिया बढ़िया”.

इस लिए अगर सदमे से बचना है तो जो र्मल रहा है उसे ख़ुशी से ले लें और आगे लड़ें, काम का अधिकार न सही, नरेगा तो है, इस का फ़ायदा उठाईये!

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